आज इस लेख में हमने Class 11 Political Science Chapter 4  कार्यपलिका के नोट्स दिए है, यह विषय अधिक महत्वपूर्ण है | इसलिए आपकी मदद के लिए नीचे नोट्स दिए है ताकि आपकी परीक्षा में मदद हो सके है, इस अध्याय का मतलब अधिकांश लोकतांत्रिक प्रणालियों में विधायी और न्यायिक शाखाओं के साथ-साथ कार्यकारी शाखा सरकार की तीन मुख्य शाखाओं में से एक है। इसका प्राथमिक कार्य विधायी शाखा द्वारा पारित कानूनों को लागू करना और सरकार के दिन-प्रतिदिन के मामलों का प्रबंधन करना है। 

अध्याय 4 - कार्यपलिका

Class 11 Political Science Chapter 4 Notes in Hindi (कार्यपालिका)

कार्यकारी क्या है?

"कार्यपलिका" यानी ''कार्यकारी'' एक शाष्त्रीय शब्द है जिसका हिंदी में "executive" अनुवाद किया जा सकता है। राजनीति और सरकारी प्रणालियों के संदर्भ में, "कार्यकारी" वह शाखा होती है जो सरकार के नियमों और निर्देशों की अमली अनुपालन करती है और सरकारी कार्यों की प्रबंधन और क्रियान्वयन की जिम्मेदारी उठाती है।

कार्यकारी शाखा उन सभी तंत्रों, विभागों और मंत्रालयों का संगठन होता है जिनका काम सरकारी नीतियों को अमल में लाना और सरकारी कार्यों की प्रबंधन करना होता है। कार्यकारी शाखा निम्नलिखित कुछ महत्वपूर्ण कार्यों का पालन करती है:
  • नीतियों का अमल
  • कार्यों का प्रबंधन
  • विभागों और मंत्रालयों का प्रबंधन
  • सरकारी पदों की नियुक्ति
  • कार्यकारी प्रमुख
  • कार्यकारी प्रशासनिक स्टाफ
  • निगरानी और संतुलन

कार्यकारी कितने प्रकार के होते हैं?

राजनीतिक और सरकारी प्रणालियों में, कार्यकारी कई प्रकार के होते हैं जो देशों और प्रणालियों के आधार पर भिन्न हो सकते हैं। निम्नलिखित कुछ मुख्य प्रकार हैं:

प्रेसिडेंटियल सिस्टम (Presidential System): 

इस प्रणाली में, राष्ट्रपति या प्रेसिडेंट देश के कार्यकारी प्रमुख होते हैं और उनका संबंध संसद से अलग होता है। यहाँ पर राष्ट्रपति अलग होते हैं, जो स्वतंत्रता से चयन होते हैं और सरकार की नीतियों को निर्दिष्ट करते हैं। इसके साथ ही, एक प्रधानमंत्री भी हो सकते हैं, जो सरकार की दैनिक प्रबंधन करते हैं। उदाहरण स्वरूप, अमेरिका का प्रेसिडेंटियल सिस्टम है।

पार्लियामेंटरी सिस्टम (Parliamentary System): 

इस प्रणाली में, राज्यपाल या राष्ट्रपति का संबंध संसद से होता है और वे केवल प्रतीकता के रूप में होते हैं। सरकार की प्रमुख नीतियों को प्रधानमंत्री द्वारा निर्धारित किया जाता है, और वे संसद के सदस्यों की बहुमत पर निर्भर करते हैं। यदि प्रधानमंत्री की निर्माणकाल के दौरान उनका आत्मविश्वास हानि पाता है, तो वे संसद के वोट से हटा दिए जा सकते हैं। उदाहरण स्वरूप, ब्रिटेन का पार्लियामेंटरी सिस्टम है।

सेमी-प्रेसिडेंटियल सिस्टम (Semi-Presidential System): 

इस प्रणाली में, दो प्रमुख व्यक्तियों का संबंध सरकार से होता है: एक प्रधानमंत्री और एक राष्ट्रपति या प्रेसिडेंट। राष्ट्रपति या प्रेसिडेंट की भूमिका सामर्थ्यशाली होती है, जबकि प्रधानमंत्री सरकार की प्रमुख नीतियों का प्रबंधन करते हैं। उदाहरण स्वरूप, फ्रांस और रूस में सेमी-प्रेसिडेंटियल सिस्टम है।

भारत में संसदीय कार्यपालिका -

भारत में, "संसदीय कार्यपालिका" एक प्रकार की शासन प्रणाली है जिसमें सरकार का प्रमुख कार्य लोकसभा और राज्यसभा के सदस्यों के द्वारा किया जाता है। यह एक प्रकार की पार्लियामेंटरी प्रणाली है जिसमें लोकसभा एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

भारतीय संविधान में संसद को तीन विभागों में विभाजित किया गया है: लोकसभा, राज्यसभा, और राष्ट्रपति। संसद का प्रमुख उद्देश्य नए कानूनों को बनाना, मौजूदा कानूनों को संशोधित करना, और सरकारी कार्यक्रमों की मान्यता प्रदान करना होता है।

लोकसभा:
  • लोकसभा भारत की प्रमुख लोकतंत्रिक निकाय है और निर्वाचित सदस्यों की संख्या केंद्र सरकार के आधार पर तय की जाती है।
  • यह सदन विधायिका की लोकप्रतिनिधित्व भाग मानी जाती है और यह सरकार के निर्देशक नीतियों को आम जनता की ओर से प्रतिष्ठित करने का काम करती है।
  • लोकसभा के सदस्यों का चयन निर्वाचन से होता है और वे प्रत्येक पांच साल में निर्वाचित होते हैं।

राज्यसभा:
  • राज्यसभा सदस्यों की संख्या स्थायी और स्थायी विनिमयित सदस्यों के संयोजन से तय की जाती है।
  • यह सदन विधायिका का वर्णन्तमात्री भाग मानी जाती है जिसका काम राष्ट्रीय हित में सुझाव और मार्गदर्शन करना होता है।

राष्ट्रपति:
  • राष्ट्रपति भारत के संविधानिक मुख्य होते हैं और संविधान के आधार पर नियुक्ति से पद पर आते हैं।
  • राष्ट्रपति का विशेष कार्य नए कानूनों की मान्यता देना, न्यायिक प्रमुख की सिफारिशों पर विचार करना, और विभिन्न संविधानिक कार्यों को करना होता है।


राष्ट्रपति की विवेकाधीन शक्तियाँ -

भारतीय संविधान में राष्ट्रपति को कई प्रकार की शक्तियाँ और कर्तव्य दी गई हैं, जो उन्हें सरकार और विशेषतः संविधान के अंग विभाग 1 के तहत निर्दिष्ट किए गए हैं। यहाँ कुछ मुख्य विवेकाधीन शक्तियाँ हैं जो भारतीय राष्ट्रपति को दी गई हैं:
  • नवाजवान सम्मान
  • नीतियों की तय
  • विशेष विचार क्षमता
  • राष्ट्रीय आवश्यकताओं की देखभाल
  • राष्ट्रीय सुरक्षा
  • कानून के अनुसार पराधीनता

प्रधान मंत्री और मंत्रिपरिषद -

भारत में, प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद (कैबिनेट) दो महत्वपूर्ण सरकारी संरचनाएँ हैं जो सरकार के कार्यों की प्रबंधन और निर्देशन करती हैं। ये दोनों संरचनाएँ भारतीय संविधान में विशिष्ट ढंग से परिभाषित हैं:

प्रधानमंत्री (Prime Minister): 
  • प्रधानमंत्री भारतीय संविधान की धारा 75 के तहत नियुक्ति से पद पर आते हैं। वे लोकसभा के सदस्यों का चुनावक्षमता द्वारा चुने जाते हैं| 
  • उन्हें उपराष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रपति के साथ मिलकर नियुक्ति दी जाती है। 
  • प्रधानमंत्री सरकार की प्रमुख नीतियों और निर्देशन की जिम्मेदारी उठाते हैं। 
  • वे सरकार की संचालन की दिशा में नेतृत्व करते हैं और संविधान के आधार पर सरकारी कार्यों का प्रबंधन करते हैं।

मंत्रिपरिषद (Cabinet): 
  • मंत्रिपरिषद सरकार के मंत्रियों का समूह होता है जिन्हें प्रधानमंत्री नियुक्त करते हैं। 
  • मंत्रियों का समूह सभी महत्वपूर्ण सरकारी विभागों की दिशा-निर्देशन करते हैं और सरकार की नीतियों को प्रमोट करते हैं। 
  • मंत्रिपरिषद के सदस्यों की संख्या संविधान के अनुसार निर्धारित होती है| 
  • वे ब्यक्तिगत मंत्रियों के रूप में विभिन्न विभागों का प्रबंधन करते हैं।

प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद का संबंध संसद के सदस्यों से होता है, और वे संविधान की दिशानिर्देशों और विशेषतः धारा 75 के तहत निर्दिष्ट किए जाते हैं। ये दोनों संरचनाएँ सरकार की संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं और देश की प्रगति और विकास में सहायक होती हैं।

स्थायी कार्यकारी और नौकरशाही -

स्थायी कार्यकारी और नौकरशाही दोनों ही सरकारी संरचनाओं के प्रकार होते हैं, जिनमें सरकारी कामकाज और प्रबंधन का आयोजन किया जाता है। ये दोनों तरीके विभिन्न तरीकों से कार्य करते हैं:

स्थायी कार्यकारी (Permanent Executive): 
  • स्थायी कार्यकारी उस प्रकार के सरकारी अधिकारी और कर्मचारियों का समूह होता है जो सरकारी विभागों में नियुक्त होते हैं और उनके पद स्थायी होते हैं। 
  • इन्हें अक्सर "सिविल सेवा" के तहत नियुक्त किया जाता है और उनका चयन परीक्षाओं और चयन प्रक्रिया के माध्यम से होता है। 
  • स्थायी कार्यकारी कर्मचारियों की स्थिति और पद स्थायी होते हैं, जिससे उन्हें सरकारी नीतियों को लागू करने में मदद मिलती है।

नौकरशाही (Bureaucracy): 

  • नौकरशाही एक सरकारी प्रणाली होती है जिसमें अधिकारी और कर्मचारी स्थानीय विभागों में नियुक्त होते हैं|
  • उनकी स्थिति और पद समय-समय पर बदलते रहते हैं। 
  • यह सामान्य रूप से नौकरशाही में नीतियों के प्रतिनिधित्व की प्रक्रिया को कहता है, जहाँ कर्मचारियों की स्थिति और पद उनके प्रदर्शन के आधार पर परिवर्तित की जा सकती है।

ये दोनों संरचनाएँ सरकारी प्रणालियों के भीतर भूमिकाएँ निभाती हैं और सरकारी कार्यकारी को प्रबंधन में मदद करती हैं। स्थायी कार्यकारी सदस्यों का चयन परीक्षाओं और निर्दिष्ट प्रक्रिया के माध्यम से होता है जबकि नौकरशाही में स्थिति की प्रतिनिधित्व की प्रक्रिया उनके प्रदर्शन के आधार पर होती है।



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